इच्छा
सृष्टि के मूल में है इच्छा। एक दृष्टांत लो। कुम्हार ने घटादि बनाने के लिए कुलाल चक्र को घुमा दिया। थोड़ी सी मिट्टी का पिड है और उस पर उसने हाथ लगा रखा है। कैसा आश्चर्य है! हाथ हिलता नहीं और कुम्हार की इच्छा के अनुसार कभी घड़ा, कभी सकोरा और कभी हाँड़ी तैयार हो जाती है। इच्छा से ही सब होता है। उपादान तो नित्य ही है सत् अथवा सत्ता, कालचक्र घूम ही रहा है, अब केवल इच्छा ही उत्पत्ति का नियामक है।
यह बात याद रखनी चाहिए कि इच्छा ही बीज है। जो इच्छा करोगे वही होगा, निश्चय ही होगा। आज नहीं तो कल। इच्छा का नाश नहीं होता। एक बार जो इच्छा की गयी, तत्काल वह अनंत में चित्रित हो गयी। समय आने पर फूटकर बाहर निकल आयेगी। मान लो तुम्हें आज घास खाने की इच्छा हुई अतएव तुम्हें एक ऐसा शरीर धारण करना पड़ेगा जिससे घास खाने की इच्छा पूर्ण हो सकती है। ऐसा शरीर धारण किये बिना वह इच्छा अतृप्त रह जायगी। जिस प्रकार की इच्छा होती है शरीर भी उसी प्रकार का धारण करना पड़ता है, चाहे वह देव शरीर हो, मानव शरीर हो या तिर्यक् शरीर। शरीर धारण किये बिना काम नहीं चल सकता। एक कथा है-
एक बार बुद्धदेव का एक भक्त अत्यंत भक्तिपूर्वक गुरुदेव के लिए सूअर का मांस तैयार करके उनके आगमन की प्रतीक्षा में बैठा था। सारा दिन बीत गया, संध्या हो गयी परंतु गुरुदेव नहीं आये। संध्या के समय एक कुत्ते ने आकर उस मांस में जो भगवान् के लिए यत्नपूर्वक रखा गया था, मुँह डाल दिया तथा उसमें से कुछ खा भी लिया। भक्त ने देखते ही कुत्ते को भगा दिया। परंतु उस दिन बुद्धदेव नहीं पधारे। दूसरे दिन उसने जाकर बुद्धदेव से सब वृत्तांत कहा और यह भी प्रकट किया कि आपके न पधारने से मेरे हृदय में बड़ा ही दुःख हुआ था। बुद्धदेव ने कहा "मैं तो कल गया था और मैंने तुम्हारे भोग को ग्रहण भी किया था। तुम मुझे पहचान नहीं सके। कल क्या तुमने एक कुत्ता नहीं देखा, मैं ही कुत्ते का शरीर धारण करके गया था। तुमने मेरे लिए जिस प्रकार का भोग रखा था, उसके अनुरूप देह धारण करके ही मैं गया था।" अतएव समझना चाहिए कि सब शरीरों में सब प्रकार के भोग नहीं हो सकते।
इच्छा की तृप्ति हुए बिना मुक्ति नहीं होती। जब तक एक भी वासना अतृप्त रहेगी, तब तक मुक्ति असंभव है।
~ मनीषी की लोकयात्रा
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