'तत्त्वालोचना की दृष्टि से मनुष्य शरीर में अलग-अलग तीन खंड हैं। मूलाधार से आज्ञाचक्र पर्यन्त जो षट्चक्र हैं, यहाँ तक कि ऊर्ध्व में सहस्त्रारचक्र तक भी, प्रथम खंड के अंतर्गत है। इसके बाद व्यापक शून्य का अनुभव होता है। इस शून्य को भेद कर सकने पर देह के द्वितीयखंड में प्रवेश हो सकता है। इस द्वितीयखंड के प्रवेश के साथ ही साथ अति विशाल तेजपुंज का साक्षात्कार होता है। यह प्रकाश कोटि-कोटि सूर्य की सम्मिलित प्रभा से भी कहीं अधिक दीप्तिमान है। कोई-कोई साधक सहस्त्रार भेद करके, यहाँ तक कि तदतीत शून्य को भी भेद करके, इस महातेज के भीतर जाकर लीन हो जाते हैं, अर्थात् इसको भेद नहीं कर पाते।
इस तेज में प्रवेश करने पर पता चलता है कि इसमें तीन पृथक् पृथक् विभाग हैं। पहले विभाग का नाम 'अक्षर' है। यह भी एक प्रकार शून्य ही है। द्वितीय विभाग का नाम 'निरक्षर' है-इसका स्वरूप महाशून्य है। इस मार्ग में आगे बढ़ने पर 'सहजपथ' मिलता है, तब 'अचिंत्य-परब्रह्मपद' की प्राप्ति होती है। जो लोग 'अक्षर-भूमि' में रहते हैं, उनकी स्थिति शून्य में ही होती है। परन्तु जो भाग्यवान हैं वे 'निरक्षर-भूमि' में जा सकते हैं और 'अचिन्त्य परब्रह्मपद' तक उठते हैं। इसके बाद और कोई मार्ग नहीं है। परंतु 'निरक्षर' से भी अतीतावस्था है। अगर कोई वहाँ तक जा सके तो उसको पहले 'सत्यलोक' मिलता है, उसके बाद 'कुमार लोक' और अंत में 'उमालोक'। यहीं तक ऊर्ध्वगति हो सकती है। इनके अनंतर और कहीं जाने के मार्ग का पता नहीं चलता।'
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~ सीतारामदास बाबा, मनीषी की लोकयात्रा
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